गांधी के सपनों का भारत -Gandhi and new india

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गांधी के सपनों का भारत -Gandhi and new india

 





आजादी के छह दशक बाद भी अक्सर चर्चा में सुनने को मिलता है कि सामाजिक ,आर्थिक और प्रशासनिक तौर पर भारत की स्थिति में  कोई खास सुधार नहीं हुआ है| हमें पराधीनता से मुक्ति तो मिल गए हैं ,लेकिन खुद को सामाजिक और राजनीतिक  जकड़न से मुक्त नहीं कर पाए ,ऐसे में हमें एक महान विचारक राष्ट्रपिता का स्मरण होता है जिसने समृद्ध और उज्जवल भारत का सपना देखा था|

आजादी से महात्मा गांधी का अर्थ केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाना नहीं था बल्कि वह गरीबी, निरक्षरता और अस्पृश्यता जैसी बुराइयों और कुरीतियों से मुक्ति का सपना देखते थे| वह चाहते थे कि देश के सारे नागरिक समान रूप से समृद्धि के सुख भोगे ,वह हमेशा कहते थे

" मैं तुम्हें एक जंतर देता हूं जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसोटी अपनाओ ,जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो उसकी शक्ल याद करो और अपने ह्रदय से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा ?क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर काबू रख पाएगा, यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को उनका स्वराज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त .??.....अब तुम देखोगे तुम्हारा संदेह मिट जाएगा और अहम समाप्त हो जाएगा"

आइए गांधी जी के कुछ विचारों पर नज़र डालते हैं जिन पर अगर शायद हम चलते तो भारत विकसित देशों में शुमार होता लेकिन अगर आज भी हम उनके विचारों को जिंदगी में अपनाएं तो अवश्य ही हम वैसा भारत बना पाएंगे जिनकी कल्पना उन लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने देश को आजादी दिलाने के बाद की थी -

अर्थव्यवस्था पर गांधीजी की सोच

महात्मा गांधी ऐसी अर्थव्यवस्था की हिमायती थे जो देश के आम जन का जीवन बेहतर कर सकें वह इकोनामी का ऐसा मॉडल चाहते थे जिसमें गांव गांव तक उद्योग हो गरीब अमीर के बीच असमानता खत्म हो और हर व्यक्ति के पास रोजगार हो गांधी जी का मंत्र था कि जब भी कोई काम हाथ में लो तो यह ध्यान भी रखें कि इससे गरीब और समाज के सबसे अंतिम या कमजोर व्यक्ति का क्या लाभ होगा?

स्वदेशी पर जोर

आजादी के पहले देश में उद्योगों पर ब्रिटेन की कंपनियों का कब्जा था भारत में कच्चा माल बनता और इन कच्चा माल के आधार पर ब्रिटेन के गांवों में तैयार माल को भारत के लोगों को उपभोग के लिए मजबूर किया जाता था इस तरह देश का करोड़ों रुपया पूरी तरह से चूस कर ब्रिटेन भेजा जा रहा था गांधी जी ने इसके खिलाफ देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी अपनाने पर जोर दिया था


 भारत का भविष्य इसके गांवों में निहित है

महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि भारत का विशेष के गांवों में निहित है वह कहते थे कि भारत गांवों में बसता है ना कि शहरों में गांव वाले गरीब हैं क्योंकि उनमें अधिकतर बेरोजगार है या अल्प बेरोजगारी की स्थिति में है इनको उत्पादक रोजगार देना होगा जिससे देश की संपत्ति में वृद्धि हो उनकी सोच यह थी कि देश में जनसंख्या बहुत ज्यादा है लेकिन उसकी तुलना में जमीन और अन्य संसाधन सीमित हैं इसलिए कुटीर यानी गांव गांव में खड़े होने वाले अत्यंत छोटे उद्योग रोजगार दे सकते हैं

सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास

गांधीजी मानते थे कि यह आवश्यक है कि विकास के लाभ अल्पसंख्यकों दलितों महिलाओं और आदिवासी समुदायों सहित समाज के उन सभी वंचित वर्गों को समान रूप से उपलब्ध हो और कोई भी इससे पीछे नहीं छूटना चाहिए वह कहते थे कि कोई भी निर्णय लेने से पहले आप यह सोचे कि जो निर्णय आप ले रहे हैं क्या उससे उस समाज के सबसे वंचित  वर्ग के गरीब लोगों को लाभ होगा या नहीं? हमें ऐसे भारत के लिए कोशिश करनी चाहिए जिसमें गरीब से गरीब लोग भी यह महसूस करें कि यह उनका देश है|

ग्रामोद्योग

1934 में गांधी जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से इस्तीफा दिया उन्होंने वर्धा में ऑल इंडिया विलेज इंडस्ट्री एसोसिएशन की स्थापना की और अधिकांश समय भारतीय गांवों के पुनर्गठन की ओर समर्पित किया गांधी जी ने ग्रामीण जीवन शैली में गांव के स्वच्छता और सुधार आदि को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयोग शुरू किए उन्होंने अस्पृश्यता को दूर करने पर भी ध्यान केंद्रित किया उन्होंने ग्रामीण पुनर्निर्माण कार्य में कई श्रमिकों को प्रशिक्षित किया जैसे ताड़ के पेड़ गुड इत्यादि से नीरा बनाना और डायरी चमड़े का काम मिट्टी के बर्तन मधुमक्खी पालन आदि में गांधीजी का मानना था कि हाथ से कढ़ाई करने वाला कपड़ा यानी खादी का कपड़ा ऐसा हब है जिसके चारों ओर सभी के उद्योग समृद्ध हो सकते हैं गांधीजी ने गांव के जीवन को स्वीकार किया लेकिन वे गांव में अज्ञानता स्वच्छता आलस्य की इच्छा को सहन नहीं कर सके

स्वच्छ और स्वस्थ भारत

गांधीजी स्वच्छता को स्वतंत्रता से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते थे, जब भी भारत के विभिन्न राज्य में यात्राओं के दौरान जाते तो जगह-जगह गंदगी ,बीमार लोग उनके दिल को अंदर से बहुत घात पहुंचाते थे ,इसलिए वह स्वच्छता को ज्यादा बल देते थे वह कहते थे "मैं भारत को स्वतंत्र और बलवान बना हुआ देखना चाहता हूं जिसमें सभी स्वस्थ और निरोग हो" उन्होंने शराब तथा अन्य नशीली वस्तुओं को समाज के लिए अभिशाप बताया. लेकिन हमें यह खुद से सवाल पूछना होगा क्या हम शराब या ऐसे अनेक अन्य मादक पदार्थों से देश को अब तक बचा पाए हैं? गांधी जी के देश की सरकार स्वयं ही शराब की दुकानें  चलवाती हैं और नशीले पदार्थों के निर्माण व बिक्री के लिए लाइसेंस जारी करती है ,क्या गांधी जी ने ऐसी समाज की कल्पना की थी? इसलिए देश को आगे बढ़ाने के लिए स्वच्छता और स्वस्थ होना काफी जरूरी है

सक्षम और समृद्ध भारत

गांधी जी के विचारों में सक्षम या समर्थ भारत का अर्थ था कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं को इस तरह सक्षम बनाना होगा कि वह अपनी आजीविका खुद सुनिश्चित कर सके| उन्होंने ग्रामीण विकास को केंद्र में रखकर वैकल्पिक टेक्नोलॉजी के साथ-साथ स्वदेशी और सर्वोदय को महत्व को भी बताया

वह कहते थे यदि देश में बेरोजगारी व्याप्त है और युवा घर पर बैठे हैं तो हम अपने किसी भी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएंगे ,इसलिए हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि यह रोजगार देने वाले लोगों का निर्माण करें वह कहते थे कि हम ऐसे समृद्ध भारत का निर्माण करें जिसमें सभी अपनी योग्यता के अनुसार कार्य करें सभी अपनी मनपसंद श्रेणियों में महारत हासिल करें|

प्रकृति का सम्मान

गांधीजी ने पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित करने जैविक और पर्यावरण हितैषी वस्तुओं का उपयोग करने तथा पर्यावरण पर किसी भी तरह का दबाव ना पैदा करने के लिए संतुलित उपभोग पर बहुत जोर दिया ,लेकिन दुर्भाग्य से आज हम एक ऐसे चरण पर पहुंच गए हैं जहां हम प्रकृति पर बोझ बन गए हैं और वसुदेव कुटुंबकम के आदर्शों की प्राप्ति असंभव हो चुकी है ,इसलिए हमें भी गांधी जी का अनुकरण करते हुए अपनी जरूरतों को तर्कसंगत बनाने के तरीकों पर चर्चा करनी चाहिए और प्रकृति का सम्मान करना चाहिए

सशक्त नारी

गांधीजी महिला सशक्तिकरण के सबसे बड़े पैरोकार थे ,उन्होंने खुले तौर पर महिलाओं को शिक्षा, विधवा, पुनर्विवाह और पर्दा व्यवस्था को समाप्त करने का समर्थन किया ,उन्होंने महिलाओं को उनके घरों से निकलकर मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर उपलब्ध करवाया

कहा भी गया है "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:"

अर्थात जहां महिलाओं की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं lशक्ति के बिना शिव भी जड़ हैं

उनके आंदोलन में महिलाओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया ,वह बाल विवाह और पर्दा प्रथा के कटु आलोचक थे वह महिला सशक्तिकरण को बढ़ाने के लिए शिक्षा को सबसे बड़ा उपकरण मानते थे  इसलिए वे कहते थे कि लड़कियों को शिक्षित करना चाहिए

स्वराज्य और अपरिग्रह

स्वराज्य अपरिग्रह महात्मा गांधी के आर्थिक विचारों के प्रमुख आधार थे अपरिग्रह का मतलब है जरूरत से ज्यादा कीजिए ना खरीदना और स्वराज का मतलब है आत्मनिर्भरता  गांधीजी ने की ऐसी अर्थव्यवस्था को बेहतर समझा जिसमें मजदूर श्रमिक स्वयं अपना मालिक हो , गांधी जी के शब्दों में स्वराज्य एक  वैदिक शब्द, पवित्र शब्द है जिसका अर्थ आत्म संयम और आत्म शासन है ,स्वराज्य निर्भर करता है हमारी आंतरिक शक्ति पर ,बड़ी से बड़ी कठिनाइयों से जूझने की हमारी ताकत पर, आजादी के बाद से हम गांधीजी के स्वराज्य से परे independence की दिशा में ही निर्बाध गति से बढ़ते चले जा रहे हैं |परिणाम स्वरूप देश भ्रष्टाचार, अपराध, हिंसा की तरफ बढ़ रहा है ,गरीबी बढ़ रही है, शासन प्रशासन अब धीरे-धीरे लोगों में समाप्त हो रहा है| हत्या, बलात्कार और लूटपाट की घटनाएं आम बात हो गई है | क्या यही बापू के सपनों का भारत है?

गांधी जी ने  राम राज्य का सपना देखा था जहां पूर्ण सुशासन और पारदर्शिता हो उन्होंने कहा" भारत में मै राम राज्य स्थापित करना चाहता हूं राम राज्य से मेरा मतलब हिंदू राज नहीं ,मेरे राम राज्य का अर्थ है- ईश्वर का राज्य मेरे लिए राम और रहीम एक ही है, मैं सत्य और धार्मिकता के ईश्वर के अलावा किसी भी और ईश्वर को स्वीकार नहीं करता, चाहे मेरी कल्पना के राम इस धरती पर हो या ना हो ,राम राज्य में निसंदेह सच्चा लोकतंत्र था जहां गरीब से गरीब  नागरिक भी एक जटिल और महंगी प्रक्रिया के बिना न्याय को लेकर आश्वस्त हो 

आइए हम सब मिलकर गांधीजी के जन्मदिन की 150वीं वर्षगांठ पर शपथ ले कि हम गांधी जी के द्वारा देखे गए भारत के सपने को साकार करें



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