ब्लैक बॉक्स-a mystery box

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ब्लैक बॉक्स-a mystery box

 

कई बार हवाई जहाज आकाश में अचानक  किसी खराबी आने कारणों से क्षतिग्रस्त हुए, इसलिए विमान दुर्घटना के सही सही कारण का पता लगाने के लिए विमान में स्थित ब्लैक बॉक्स एक बहुत उपयोगी यंत्र साबित होता है. विमान के सबसे सुरक्षित माने जाने वाली पिछले भाग में रखा जाने वाला ब्लैक बॉक्स दो भागों फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर तथा कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर का बना होता है इसकी मजबूती का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि यह 1100 डिग्री के तापमान पर अथवा  226 किलो कठोर स्टील को इस पर 10 फुट से गिराने पर भी क्षतिग्रस्त नहीं होता ब ब्लैक बॉक्स के दो अलग अलग हिस्से होते हैं कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर ब्लैक यानी काले रंग का होता है जबकि फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर गहरे लाल रंग का होता है उसका नाम  black box इसलिए रखा गया क्योंकि कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर के अंदर फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर होता है तथा इस प्रकार यह काला दिखाई देता है ब्लैक बॉक्स को खोल कर अंदर से फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर निकाला जाता है जिसकी जानकारियां महत्वपूर्ण होती है

ब्लैक बॉक्स का आकार

ब्लैक बॉक्स  का आकार  13 * 20* 30 सेंटीमीटर का होता है यह देखने में किसी ब्रीफकेस जैसा लगता है तथा पूर्ण तहत जेलरोधी एवं तापरोधी होता है इनबॉक्स में ध्वनि प्रसारक यंत्र भी लगे होते हैं तथा एक विशेष प्रकार की बैटरी से जुड़े होते हैं यह बैटरी साधारणतया बंद रहती है तथा दुर्घटना होने की स्थिति में स्वता ही चालू हो जाती है यह बैटरी एक विशेष प्रकार की आवाज करती है तथा एक बार चालू होने पर करीब 30 दिन तक लगातार  चली रहती है

ब्लैक बॉक्स का इतिहास

बढ़ती हवाई दुर्घटना के कारण ऐसा उपकरण तैयार करने के बारे में विचार होने लगा जिससे दुर्घटना के कारण की सही जानकारी मिल सके और विमानों को भविष्य में दुर्घटना से बचाने में भी मदद हो इस उद्देश्य से ब्लैक बॉक्स का आविष्कार किया गया पहले लाल रंग के कारण इसे रेड एग के नाम से जाना जाता था शुरुआती दिनों में इसकी भीतरी दीवारें काले रंग की थी संभवत इसलिए ब्लैक बॉक्स के रूप में जाना जाने लगा


1953 में पहली बार तैयार किया गया बॉक्स

ब्लैक बॉक्स बनने का विचार सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया की ड्यूड वारेन के दिमाग मे आया था उनके पिता की मौत 1934 में विमान हादसे में हुई थी उस वक्त उनकी उम्र मात्र 9 वर्ष की थी उन्होंने 1950 में ब्लैक बॉक्स पर काम करना शुरू किया 1953 में पहली बार एयरोनॉटिकल रिसर्च लैबोरेट्री में ब्लैक बॉक्स तैयार किया गया

ब्लैक बॉक्स के भाग

  • फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर

फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर विमान की उड़ान संबंधी जानकारी ,विमान की गति, समय ,गुरुत्व बल ,विमान के ऊपर नीचे होने की स्थिति ,आदि सभी जानकारी इस में लगी धातु की पतली पट्टी पर ज्यों की त्यों रिकार्ड होती रहती हैl रिकार्ड की गई जानकारियों को विशेष यंत्रों द्वारा ज्ञात कर दुर्घटना का कारण व समय आदि ज्ञात किया जाता है lइस प्रकार किसी भी विमान की असामान्य ऊंचाई ,वेग में परिवर्तन का भी इस पर अंकित सूचनाओं से पता लगाया जा सकता है lआधुनिक विमानों में फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर के स्थान पर  कंप्यूटर युक्त फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर उपयोग में लाए जाते हैं ,जिसे साधारणतया 200 उड़ानों के बाद बदला जाता है lकंप्यूटर युक्त  डाटा रिकॉर्डर विमान तथा उसके इंजनों से संबंधित 50 से अधिक जानकारियां ,इंजनों की शक्ति ,गति, दबाव ,यात्री कक्ष का तापमान रेडियो संपर्क का समय आदि जानकारियां देता है lइन ब्लैक बॉक्स की सहायता से उड़ान संबंधित चित्र भी प्राप्त हो सकते हैं

  • कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर

कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर के द्वारा विमान के चालक कक्ष में हुई बातचीत तथा रेडियो पर किए गए वार्तालाप ,चालक कक्ष में बजने वाली घंटी, विमान के इंजनों का शोर रिकॉर्ड किए जाते हैंl घरेलू टेप रिकॉर्डर की तरह सभी बातें एक सुदृढ़ ढांचे में स्वता ही रिकॉर्ड हो जाती हैl यह रिकॉर्डिंग विमान के इंजन बंद होने के साथ ही बंद हो जाती है ,इस प्रकार प्राप्त किए गए संदेशों की निरंतर रिकॉर्डिंग होती रहती है ,हर आधे घंटे बाद स्वता ही नई रिकॉर्डिंग होती रहती है विमान की रेडियो संदेश ,चेतावनी की घंटी आदि रिकॉर्ड होती रहती है जिसे विशेषज्ञ द्वारा लिखित रूप में ज्ञात कर लिया जाता है इस प्रकार ब्लैकबुक से ना केवल दुर्घटना के कारणों का पता चलता है वरन दुर्घटना के पूर्व कॉकपिट तथा विमान में हुई दुर्घटना का पता  चल सकता हैl

रोचक तथ्य

  • ब्लैक बॉक्स जिस जगह पर घर गिरता है तो 30 दिन तक प्रत्येक सेकंड एक बीप की आवाज निकालता है जिसे दो-तीन किलोमीटर की दूरी से पहचाना जा सकता है

  •  ब्लैक बॉक्स के संबंध में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि समुद्र में 14000 फुट की गहराई से भी संकेत दे सकता है समुद्र में विमान के गिरने पर ब्लैक बॉक्स में लगी अंडर वाटर लोकेटिंग डिवाइस चालू हो जाती है जो पानी के संपर्क में आते ही स्वता काम करना शुरु कर देती है और सिग्नल देने लगती है

  •  ब्लैक बॉक्स को आमतौर पर विमान के पीछे के हिस्से में लगाया जाता है ,कॉकपिट में नहीं ऐसा इसलिए क्योंकि दुर्घटनाग्रस्त विमान का पीछे का हिस्सा सबसे कम प्रभावित होता है और इसलिए ब्लैक बॉक्स के बचाने की अधिक संभावना होती हैl


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