समाज में ऐसे नर रत्न पैदा हुए हैं महापुरुष पैदा हुए हैं जिसके कारण हम सबको उत्तम विरासत प्राप्त हुई है आज हम कम ही लोगों को पता होगा कि अय्यंकाली कौन थे केरल की धरती पर जन्म में महान समाज सुधारक महात्मा अय्यंकाली जी एक ऐसे सुधारक थे जिन्होंने जिन्होंने दलितों और पिछड़ों में आत्मसम्मान की भावना पैदा करने और महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका पैदा की जैसी ज्योतिबा फुले डॉक्टर अंबेडकर नारायण गुरु और ई वी रामास्वामी पेरियार ने की है
जन्म
अय्यंकाली जी(28 अगस्त 1863 - 1941) का जन्म तिरुवंतपुरम से 13 किलोमीटर दूर वेंगर्नूर में 28 अगस्त 1863 को हुआ था पिता अयन और मां माला की आठ संतानों में सबसे बड़े थे उनका जाती पुलाया थी जो वहां जातियों में सबसे नीच की मानी जाती थी उनका नाम काली था पिता का नाम आगे लगने के बाद उनका नाम अय्यंकाली हो गया जमीदार लोग अपनी मर्जी से उन्हें किसी भी काम में झोंक देते थे सुबह से शाम तक काम कराने के बाद उन्हें मिलता था मुश्किल से 600 ग्राम चावल वह भी गला सड़ा होता था
बचपन में ऊंची जातियों द्वारा अपमान
अछूत होने के कारण अय्यंकाली को केवल अपनी जाति के बच्चों के साथ खेलने का अधिकार था केरल में उस समय अछूत जाति के लोगों को बहुत ही अपमान सहना पड़ता था अगर किसी रास्ते से गुजर भी जाएं तो उन्हें उस रास्ते पर दोबारा झाड़ू लगाना पड़ता था अय्यंकाली जी को एक दिन फुटबॉल खेलते समय उनकी गेंद एक ऊंची जाति के घर में जा गिरी क्रोधित गृहस्वामी ने उनको डांटा और मारा जातियों के करीब आने ना आने की हिदायत दी अय्यंकाली जी बहुत इससे आहत हुए और उन्होंने भविष्य में किसी स्वर्ण जाति से दोस्ती ना करने की ठान ली तभी से उनके मन में दलित जातियों के लोगों को उनका सम्मान दिलाने की भावना पैदा हुई
महान जनप्रतिनिधि (महात्मा गांधी भी थे कायल)
संत अयंकाली जी ने एक कायल सभा के द्वारा एक अद्भुत सत्याग्रह किया गया था। हम नार्थ के लोगों को मालूम नहीं है, लेकिन केरल के दलित समाज को जागृत करने के लिए उनके अधिकारों के लिए, उस समय शासकों ने वहां के, अन्य लोगों ने, वहां के समाज के अगुवा लोगों ने, ये करने से मना कर दिया। ये कहा कि तुम्हें जमीन की इंच की जगह नही मिलेगी, सम्मेलन करने के लिए। उस जमाने में एक दलित मां का बेटा, सारा समाज सामने हो तो क्या करता, चुप हो जाता, बैठ जाता?
अयंकाली जी चुप नहीं हुए। उन्होंने ठान ली कि मैं इस जुल्म के खिलाफ संघर्ष करूंगा। उन्होंने रास्ता खोजा। उन्होंने सब नावें इकट्ठी की, नौकाएं इकट्ठी की और समुद्र के अंदर एक नौकाओं के द्वारा एक विशाल जगह बना दी और नाव में सभा की उन्होंने। वह कायल सभा जो कही जाती है, 1913 के हर प्रतिबंध के बीच, समुंदर के अंदर। जमीन नहीं देते हो तो आप जानें, दुनिया जाने। परमात्मा ने मुझे जगह दी है समुन्दर को चीर कर के मैं वहां जायूँगा, लेकिन मैं हक़ों की लड़ाई लडूंगा, ये मिजाज अयंकाली जी ने बताया। समुन्दर में नाव इक्कठी कर कर के, नौकायें इक्कठी करके, वहीं उन्ही नौकायों में मंच बनाया, नाव में ही श्रोता आये और उन्होने सत्याग्रह किया था।
महात्मा गाँधी 1915 में हिंदुस्तान आये थे और बाद में महात्मा गाँधी ने जब अयंकाली जी की इस शक्ति को देखा तो, महात्मा गाँधी जी ने स्वयं संत अयंकाली जी को मिलने गये थे।
शिक्षा क्रांति
1904 में अय्यंकाली ने दलित और दूसरे अछूतों के लिए शिक्षा के लिए एक स्कूल खोला परंतु उच्च जातियों लोगों से वह वर्षा बर्दाश्त ना हुआ उन्होंने स्कूल पर हमला कर उसे तहस-नहस कर दिया किसी बिना विलंब किए अय्यंकाली ने स्कूल का नया ढांचा खड़ा कर दिया अध्यापक को सुरक्षित लाने ले जाने के लिए रक्षक लगा दिए तनाव और आशंकाओं के बीच स्कूल फिर चलने लगा 1 मार्च 1910 को सरकार ने शिक्षा नीति पर कठोरता से पालन के आदेश दे दिए दलित विद्यार्थियों को स्कूल में प्रवेश करते देख स्वर्णो ने हंगामा कर दिया उस दिन 8 दलित छात्रों को प्रवेश मिला उन्होंने दलितों की संपत्ति अधिकार शिक्षा राज्य की नौकरियों में भी विशेष आरक्षण दिए जाने और बेकार से मुक्ति की मांग की
उस समय दलित शोषित पीड़ित वंचित पिछड़े इन के लिए शिक्षा उनका प्राथमिक विषय रहा था उसके कारण केरल के समाज जीवन में इतना बड़ा बदलाव आया इतना परिवर्तन आया
महापुरुष
संगठित बनो संघर्ष करो शिक्षित बनो संत अय्यंकाली जी ने इन तीन मंत्रों को लेकर समाज को सशक्त बनाने का काम किया था ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने समाज के हकों के लिए लड़ाई लड़ी समाज की अंतर चेतना जगाई लेकिन सामाजिक एकता को कभी आंच न आए इसके लिए वे सदैव प्रयासरत रहे उन्होंने दलित उधार के लिए लड़ाई लड़ी लेकिन दलितों के अंदर कभी नफरत की आग जलाने का प्रयास नहीं किया समाज के प्रति प्रेम उसमें कभी कटता को जन्म ना आए इसके लिए उन्होंने एक जागरूक प्रयास किया हम भाग्यशाली हैं एक प्रकार से सदियों से हम देखें कोई युग ऐसा नहीं आया कि हमारे भीतर कोई बुराइयां आई हैं तो हमारे भीतर ही कोई महापुरुष भी पैदा हुआ है हमारे भीतर से ही ऐसे महापुरुष पैदा होते हैं जो हमारी कमियों को दूर करके हमें सशक्त बनाने का निरंतर प्रयास करते हैं.





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