स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में सांप्रदायिक दंगे चरम सीमा पर थे. देश की बड़ी जनसंख्या का भाग अपने ही देश में स्वयं को शरणार्थी या विदेशी महसूस कर रहा था. हमारी सामाजिक और आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी थी.
15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को नेहरू जी ने नियति के साथ भेंट(Tryst with Destiny) नामक अपने भाषण से विश्व के समक्ष भारत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जगाने के लिए प्रेरित किया था. आजादी के साथ-साथ हमें देश का बंटवारा भी देखना पड़ा.
अंग्रेजों की बांट और राज करो (Divide and Rule) नीति के कारण देश का बंटवारा हो गया. विभाजन की त्रासदी में लगभग 500000 लोग मारे गए और लगभग एक करोड अधिक लोग इससे प्रभावित हुए थे.
इस विभाजन के कारण जहां दोनों पक्ष के नेताओं ने अपनी-अपनी विजय पर जश्न मनाना आरंभ किया. वहीं करोड़ों लोगों के सपने टूट गए ,लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाना पड़ा ,करोड़ों लोग बेघर हो गए तथा कितने ही लोग विभाजन की इस आग से प्रभावित हुए.
भारत में समस्याएं का आरंभ माउंट बैटन की घोषणा से आरंभ हुआ .जिसके अंतर्गत उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा जून 1948 के बजाय अगस्त 1947 करने की थी. सत्ता हस्तांतरण के कार्य को शीघ्र ही निपटाने के उद्देश्य से माउंटबेटन ने रेडक्लिफ(Redcliff) के नेतृत्व में एक सीमा आयोग का गठन किया. इस आयोग ने भारत और पाकिस्तान के मध्य सीमा का निर्धारित किया .इसके अंतर्गत पाकिस्तान में मुस्लिम बहुल क्षेत्र और हिंदू बहुल क्षेत्र को भारत में शामिल किया गया बंगाल और पंजाब का विभाजन किया गया.
मार्च 1947 में मुस्लिम लीग द्वारा रावलपिंडी जिले के सांप्रदायिक दंगे भड़का दिए गए जिसके परिणाम स्वरुप अकेले रावलपिंडी में लगभग 2100 लोग मारे गए ,घायल हुए .शीघ्र ही सांप्रदायिक दंगों की आग लाहौर ,अमृतसर और अनेकों राज्यों में फैल गई. यह देंगे तो मात्र एक संकेत थे, जिसकी चिंगारी स्वतंत्रता प्राप्ति के समय होने वाले दंगों के प्रति सरकार को सचेत करने के लिए थी.
लाहौर, अमृतसर ,कोलकाता में स्वतंत्रता की घोषणा के बाद अनेकों सांप्रदायिक दंगों की भेंट, बच्चे और बुजुर्ग चढ़े. दोनों तरफ अल्पसंख्यकों के पास एकमात्र रास्ता यही बचता था कि वह अपने घरों को छोड़ दें. सीमा के दोनों और हजारों की संख्या में औरतों को अगवा कर लिया गया उन्हें जबरन शादी करनी पड़ी और उन्होंने उनका धर्म भी बदलना पड़ा लोगों ने अपनी कुल की इज्जत बचाने के लिए बहू बेटियों को मार डाला पंजाब की प्रसिद्ध कवित्री अमृत प्रीतम ने विभाजन की त्रासदी पर लिखा-
""अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ कित्थों क़बरां विच्चों बोल,
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरका फोल,
इक रोई सी धी पंजाब दी तू लिख-लिख मारे वैन,
अज्ज लक्खां धीयाँ रोंदियाँ तैनू वारिस शाह नु कैन,
उठ दर्दमंदां देआ दर्देया उठ तक्क अपना पंजाब,
अज्ज बेले लाशां बिछियाँ ते लहू दी भरी चनाब.""
मुस्लिम पाकिस्तान का विचार सर्वप्रथम पंजाब के उर्दू के प्रसिद्ध कवि- डॉक्टर मोहम्मद इकबाल ने किया था 1930 में इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के वार्षिक सम्मेलन में उन्होंने कहा था "मैं चाहता हूं कि पंजाब उत्तर-पश्चिमी सीमा में सिंध बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बना दिया जाए"
- पाकिस्तान- शब्द को "पंजाब ,अफगानिस्तान के सीमा प्रांत, कश्मीर, सिंधु के प्रारंभिक अक्षरों को बलूचिस्तान के स्तान से मिला कर बनाया गया था.
कांग्रेसी नेता भारत की अखंडता को स्थिर रखने के पक्ष में थे यहां तक कि महात्मा गांधी ने भी कहा था-
- {" चाहे सारा भारत जल जाए ,मैं पाकिस्तान की मांग से सहमत नहीं होगा, भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा और जब तक मैं जीवित हूं भारत का विभाजन नहीं होने दूंगा."}. परंतु परिस्थितियों में विवश होने के कारण भारत का विभाजन ऐतिहासिक सत्य बन गया और 15 अगस्त को भारत और पाकिस्तान के अलग-अलग अधिराज्य की स्थापना कर दी गई.
भारत के विभाजन के कुछ कारण थे जिनका वर्णन इस प्रकार है÷
- सांप्रदायिक झगड़े-
1940 ईस्वी में मुस्लिम लीग द्वारा मुस्लिम राज्य की मांग का प्रस्ताव पास होने से सांप्रदायिक झगड़ों में बहुत ही तेजी से वृद्धि हुई 16 अगस्त 1946 में कलकत्ता महा नगरी में मानवीय रक्त की भयानक होली खेली गई .सैकड़ों व्यक्ति मारे गए सहस्त्र ओं गंभीर रूप से घायल हो गए. करोड़ों की संपत्ति नष्ट की गई
धीरे-धीरे यह झगड़े समस्त देश में फैलते गए और देश में गृहयुद्ध आरंभ होने की संभावना बन गई.
सरदार पटेल ने इस संबंध में कहा-" मैंने विभाजन को अंतिम उपाय के रूप में स्वीकार किया क्योंकि हम ऐसी परिस्थितियों में उलझ गए थे जहां हम सभी कुछ खो बैठते".
- ब्रिटिश अधिकारियों की साजिश
अंग्रेजों के शासन काल के अंतिम दिनों में फैल रही अशांति अंग्रेज अधिकारियों की साजिश का परिणाम था अंग्रेजों ने शुरु से ही" फूट डालो राज करो"(divide and rule) की नीति को अपनाया. अंग्रेज अधिकारी ने मुस्लिम लीग को अपनी नीति से सदैव उत्साहित किया. शासन के सभी महत्वपूर्ण पदों पर मुस्लिम लीग समर्थकों को नियुक्त किया. भारत में मुस्लिम लीग की स्थापना ही लॉर्ड मिंटो और दूसरे अंग्रेज अधिकारियों की चाल थी. क्रिप्स योजना ने भले ही पाकिस्तान की मांग को अस्वीकार कर दिया. परंतु इस योजना में पाकिस्तान के बीज विद्यमान थे.
सरदार पटेल ने 25 जनवरी 1948 को बीएचयू मे कहा-" मैंने अनुभव किया कि यदि भारत के विभाजन को स्वीकार नहीं करते तो भारत के टुकड़े हो जाएंगे और इस प्रकार भारत पूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगा"
- मोहम्मद अली जिन्ना की जिद्द
मोहम्मद अली जिन्ना बहुत ही महत्वकांक्षी और हटी पुरुष थे कांग्रेस ने समय-समय पर हिंदू मुस्लिम एकता को स्थापित करने के लिए जिन्ना की कई अनुचित मांगे स्वीकार की जिनके कारण वह और हटी होते गए ब्रिटिश सरकार से उनको पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त था 1940 में उनकी मांग शिखर पर पहुंची और उन्होंने पृथक पाकिस्तान राज्य की घोषणा कर दी. शिमला कॉन्फ्रेंस को असफल बनाने वाले जिन्ना थे. अंतरिम सरकार की असफलता भी उनकी कुचालों के कारण थी .कांग्रेस ने सदैव मुस्लिम लीग के प्रति कमजोर नीति का प्रकटीकरण किया गांधी जी ने भी मिस्टर जिन्ना को" कायदे आजम "का सम्मान देकर उनको अभिमानी बना दिया जब मिस्टर जिन्ना ने कांग्रेश छोड़ी तब उनका कद कम हो गया था लेकिन गांधीजी की कुछ भूलो का यह परिणाम था कि जिन्ना ने भारतीय राजनीति में फिर महानता प्राप्त कर ली वह इतने महत्वकांक्षी हो गए थे और इतने अभिमानी हो गए थे कि वह समझने लग पड़े थे कि उनके सहयोग के बिना भारत के संवैधानिक समस्या को हल ही नहीं किया जा सकता .उन्होंने पाकिस्तान की मांग के संबंध में ऐसा व्यवहार अपनाया कि वह पाकिस्तान से कम किसी प्रकार की पेशकश को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे परिणाम यह निकला कि मिस्टर जिन्ना की हठ-धर्मिता के आगे नियमों की बलि देकर भारत का विभाजन हमें स्वीकार करना पड़ा.
पंडित नेहरू ने इस संबंध में कहा हम "सिर दर्द को दूर करने के लिए ,हम सिर काटने को तैयार हो गए हैं"














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